कांगड़ा में सैर पर्व का विशेष महत्व, ऐसे मनाया जाता है पर्व
भादों यानि काले महीने में मायके गई नवेली दुल्हनें भी इस महीने अपने ससुराल वापस आ जाती हैं। इस उत्सव को मनाने के पीछे एक धारणा यह है कि प्राचीन समय में बरसात के मौसम में लोग दवाईयां उपलब्ध न होने के कारण कई बीमारियों व प्राकृतिक आपदाओं का शिकार हो जाते थे और जो लोग बच जाते थे वे अपने आप को भाग्यशाली समझते थे। बरसात के बाद पड़ने वाले इस उत्सव को ख़ुशी ख़ुशी मनाते थे, तब से लेकर आज तक इस उत्सव को बड़ी ही धूमधाम से मनाया जाता है।
इस तरह होती है सैर पूजनः-
सायर के दिन अपने घर के आंगन में इष्ट देव के पास एक टोकरी में रख दिया जाता है। सायर से एक दिन पहले जो-जो चीजें इकट्ठा करनी होती हैं वे धान का पौधा, तिल का पौधा, कोठा का पौधा, एक दाडू, एक पेठा, एक मक्की, कुछ अखरोट, ककड़ी, एक पुराना सिक्का, एक खट्टा, एक कचालू का पौधा आदि हैं।
अगली सुबह इस टोकरी को घर के अन्दर लाया जाता है। इस टोकरी में गणेश जी को स्थापित कर सारी सामग्री की पूजा की जाती है। रक्षा बंधन को बंधी डोरी को भी आज ही के दिन खोला जाता है और उसे भी सायर के पात्र में रख दिया जाता है। परिवार के सभी सदस्य एक एक करके सायर के पात्र को माथे से लगा लेते हैं और प्रार्थना करते हैं कि जिस प्रकार इस बार सुखपूर्वक आई है आगे भी ऐसे ही आते रहना।
सायर पूजन के बाद उसे गौशाला में घुमाया जाता है और फिर पानी में विसर्जित कर दिया जाता है। इसके अलावा इस दिन घर के बुजुर्ग और महिलाएं हाथ में भोजन की थालियां एक-दूसरे को परोसती हैं।

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